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लेटरल इंट्री

पारदर्शी लेटरल इंट्री से विशेषज्ञों की सेवायें मिलेंगी

आज कोई भी इस बात से इंकार नहीं करेगा कि भारत की तरक्की में सबसे बड़ी बाधा अगर कोई है तो वहनौकरशाही है, जिसने विकास की इस प्रक्रिया को धीमा करने में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। नौकरशाही की औपनिवेशिक मानसिकता, उनकी असक्षमता, उसका गैर-विशेषीकरण, उनका निजी स्वार्थ, सभी ने मिलकर भारत की इस तस्वीर को स्वरूप दिया है।

नौकरशाही के सुधार पर टीएसआर सुब्रमण्यम समिति ने अपनी सिफिरिश दी थी कि लेकिन कितनी ही सिफारिशें इस स्थान पर कारगर नहीं हो पाईं क्योंकि उन्हें लागू नहीं किया जा सका और नौकरशाही की यूनियन उन्हें लागू करने भी नहीं देगी।

इसी दिशा में लेटरल इंट्री एक कदम है। ज्ञातव्य है की भारत की जितनी भी eye ball grabbing परियोजनाएं हैं जैसे- दिल्ली मेट्रो, कोंकण रेलवे, आधार कार्ड, अमूल आदि सभी को विशेषज्ञ लोगों ने ही सफल बनाया है, नौकरशाही ने नहीं। लेटरल इंट्री इसी सन्दर्भ में महत्वपूर्ण हो जाता है। वैसे भी संयुक्त सचिव स्तर तक के अधिकारियों की भारी कमी है और ऐसे अधिकारियों की जरूरत है जो नई योजनाओं को लागू करने की आवश्यक विशेषज्ञता से लैस हों। इसके कारण ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ब्रिटिश परंपरा से चले आ रहे प्रशासनिक अमले का लौहद्वार निजी क्षेत्र के योग्य लोगों के लिए खोलने का निर्णय लिया है। ऐसा होने से भारतीय प्रशासनिक व्यवस्था भी वैश्विक प्रचलनों को अपनाने की ओर बढ़ेगी। यह एक बहुत साहस भरा कदम है जिसकी जरूरत बहुत लंबे समय से महसूस की जा रही थी।

भारतीय प्रशासनिक सेवा में 1999 से 2007 तक अधिकारियों की बहुत कम भर्ती हुई और उसका प्रभाव अब दिखाई देने लगा है। सरकार ने मृदा स्वास्थ्य कार्ड, फसल बीमा योजना जैसी कई नई योजनाएं शुरू की हैं और अधिकारियों को इनको लागू करने के लिए विशेषज्ञों की सहायता लेनी पड़ती है। दिल्ली मेट्रो के मुख्य कार्यकारी ई.श्रीधरन, आधार कार्ड परियोजना का दायित्व संभालने के लिए आए इंफोसिस के नंदन नीलकेणी, मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमण्यम, नीति आयोग के उपाध्यक्ष अरविंद पनगढ़िया की सफलता लेटरल इंट्री के उपयोगी होने के कुछ प्रमुख उदाहरण हैं। सरकार शीघ्र ही उप सचिव स्तर पर 40 अधिकारियों की  भी नियुक्ति लेटेरल इंट्री से करने की तैयारी में है।

भारतीय प्रशासकीय सेवा के अधिकारी आमतौर पर सामान्यतावादी (generalists) होते हैं और उनके व्यापक दृष्टिकोण संपन्न होने के अपने लाभ हैं। लेकिन ऐसे युग में जब नीति निर्माण का कार्य विशेषज्ञतापूर्ण होता जा रहा है, प्रशासन में जटिल और गतिशील प्रौद्योगिकियों की जानकारी आवश्यक होती है, वहां ऐसे अधिकारियों की आवश्यकता है जो उसी क्षेत्र से उभर कर निकले हैं। प्रशासनिक सेवा में चयनित सामान्य स्नातक अधिकारी तकनीकी प्रकृति के मंत्रालयों या विभागों में नीति निर्माण संबंधी कार्यों में कठिनाई अनुभव करते हैं। इनकी मूल प्रवृत्ति जिला संचालन के ढंग पर कार्य करने की होती है। इसमें वे ऐसे ढंग से कार्य करते हैं जिससे मौजूद तंत्र में किसी बड़े परिवर्तन या मौलिक विचारों को लागू करने से बचने की प्रवृत्ति होती है। जिले का संचालन बिना किसी व्यापक उथल-पुथल के करने पर ही सबसे ज्यादा जोर होता है।

प्रशासनिक सुधार आयोग ने भी अपनी सिफारिशों में कहा है कि कुछ पदों और पदों की श्रेणियों को केवल सामान्यतावादी श्रेणी के अधिकारियों के लिए अब और अधिक समय तक आरक्षित नहीं रखा जाना चाहिए। कार्यों की योजना में सामान्यतावादी अधिकारियों का अपना स्थान है और महत्त्वपूर्ण स्थान है, किंतु वैसे ही महत्त्वपूर्ण स्थान विशेषज्ञों तथा टैक्नोलॉजी विशेषज्ञों का भी है।

एक लोकतंत्र में जब सरकारें लगातार बदलती रहती हैं तो एक स्थाई प्रशासनिक सेवा के अपने लाभ हैं। इसके बावजूद प्रशासन में नई ऊर्जा और नवीन विचारों के प्रवेश के लिए उसका खुला होना भी जरूरी है। लेटरल इंट्री जैसे कदम से प्रशासन में अतिरिक्त मानव संसाधन का प्रवेश होगा, विशेषज्ञता और नवीन विचारों की वृद्धि होगी। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने पहले सभी सेवाओं के लिए संयुक्त सचिव स्तर की नियुक्तियों को खोला था। आज संयुक्त सचिव स्तर के 65 प्रतिशत पदों पर दूसरी सेवाओं से आए गैर-आईएएस नियुक्त हैं। यह भी लेटरल-एंट्री जैसा ही कदम है।

ऐसा नहीं है कि मौजूदा सरकार ही ऐसा करने की पहल कर रही है। इससे पहले भी सभी प्रधानमंत्री किसी न किसी रूप में ऐसा करने का प्रयास कर चुके हैं। जवाहरलाल नेहरू ने 1953 में इंडस्ट्रियल मैनेजमेंट पूल नाम की सर्विस शुरू की थी। इसे बाद में आईएएस लॉबी ने तबाह कर दिया। ये लोग पब्लिक सेक्टर के सारे पद अपने पास रखना चाहते थे। लाल बहादुर शास्त्री ने डॉ. वर्गीज कुरियन को नेशनल डेयरी डेवलपमेंट बोर्ड का चेयरमैन नियुक्त किया। कुरियन कैरा डिस्ट्रिक कॉपरेटिव मिल्क प्रोड्यूसर यूनियन के फाउंडर थे।

इंदिरा गांधी ने मंतोश सोंढी को हैवी इंडस्ट्री विभाग में उच्च पद पर बहाली की थी। सोंढी अशोक लिलेंड और बोकारो स्टील प्लांट में सेवा दे चुके थे। एनटीपीसी के फाउंडर चेयरमैन डीवी कपूर ऊर्जा मंत्रालय में सचिव बने थे। केरल स्टेट इलेक्ट्रॉनिक्स डेवलपमेंट कॉरपोरेशन के चेयरमैन केपीपी नांबियार को राजीव गांधी ने इलेक्ट्रॉनिक्स विभाग की जिम्मेदारी सौंपी थी। सैम पित्रौदा को राजीव गांधी ने कई जिम्मेदारियां सौंपी थी।

पूर्व पीएम मनमोहन सिंह ने लैटरल एंट्री की पैरवी की थी। विमल जालान आईसीआईसीआई बैंक के बोर्ड के सदस्य थे। बाद में उन्हें सरकार में प्रवेश मिला। आगे चलकर वह भारतीय रिजर्व बैंक  के गवर्नर बने। इसी तरह से मोंटेक सिंह अहलूवालिया, जगदीश भगवती और टी.एन. श्रीनिवासन ने सरकारी तंत्र के माध्यम से देश को अपनी सेवाएं दी। रघुराम राजन को भी मनमोहन सिंह ने ही भारतीय रिजर्व बैंक का गवर्नर बनाया। सिविल सेवा रिव्यू कमेटी के अध्यक्ष योगेन्द्र अलग ने 2002 में लैटरल एंट्री की वकालत की थी।

एक सवाल यह उठ सकता है कि क्या लैटरल एंट्री के नाम पर सरकार उच्च पदों पर अपनी पसंद के लोगों और निजी कंपनियों वाले करीबियों को भरने की तैयारी में हैं। कुछ लोगों ने इस बहाली में आरक्षण की मांग कर दी। ऐसे सवाल तो उठते ही रहेंगे लेकिन सरकार अपनी पारदर्शी कार्रवाई से इन सभी को जवाब दे सकती है। बेदाग अधिकारियों की चयन समिति उम्मीदवारों का साक्षात्कार लेगी और उसके बाद मंत्रिमंडल की नियुक्ति समिति इस चयन को अपनी मंजूरी देगी। इस बारे में सबसे महत्वपूर्ण सुझाव यह है कि इन नियुक्तियों के लिए लोगों को चयनित करने का काम संघ लोकसेवा आयोग को ही सौंप दिया जाना चाहिए। यद्यपि ऐसी नियुक्तियां यदि एक वर्ष से ज्यादा समय के लिए होती हैं तो संघ लोकसेवा आयोग से उनकी मंजूरी लेनी होती है।

सरकार के सामने सबसे बड़ी समस्या निजी क्षेत्र मेंकाम करने वाले लोगों को सरकारी क्षेत्र में लाने पर हितों के टकराव को रोकने की होगी। निजी क्षेत्र के व्यक्ति के निष्पक्ष होने के बावजूद धारणाएं महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगी और ऐसे लोगों को सरकारी तंत्र में काम करना कठिन हो सकता है। लेटरल इंट्री से आए अधिकारियों को सीधी भर्ती से आए अपने ऊपर के अधिकारियों और उसी प्रक्रिया से चयनित अधीनस्थों के बीच सामंजस्य स्थापित करने के लिए बहुत प्रयास करने होंगे। इसका अनेक उदाहरण डॉ. कुरियन से लेकर नंदन नीलकेणी के अनुभवों से स्पष्ट हो जाते हैं। डॉ. कुरियन ने तो केवल सरकारी तंत्र से बचने के लिए ही नेशनल डेयरी डेवलपमेंट बोर्ड का मुख्यालय आणंद में ही बनाने पर जोर दिया था। भारत को प्रतिभा की जरूरत तो है लेकिन उससे भी अधिक जरूरत मूल्यों की है, ईमानदार लोगों की है, कार्य के प्रति समर्पित लोगों की है।

​K. SIDDHARTHA

www.ksiddhartha.com

Strategic Thinker,​ Earth Scientist, Author, Advisor to Governments, and Mentor.

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